श्री अरविंद का शिक्षण
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श्री अरविंद के शिक्षण का प्रारंभ प्राचीन भारत के ऋषियों के दर्शन से होता है कि विश्व के बाह्य रूपों के पीछे एक अस्तित्व और चेतना की वास्तविकता है — जो सभी वस्तुओं की एकमात्र और शाश्वत आत्मा है। सभी जीव इस आत्मा और अस्तित्व में एक हैं, किंतु चेतना की एक विभाजन प्रक्रिया के कारण वे भिन्न प्रतीत होते हैं। मन, प्राण और शरीर में वे अपने सच्चे आत्मा और वास्तविकता से अनभिज्ञ हैं। एक विशिष्ट मनोवैज्ञानिक साधना द्वारा इस भिन्नता की चेतना के आवरण को हटाया जा सकता है और इस सच्चे आत्मा का, सभी में और सर्वत्र स्थित दिव्यता का अनुभव किया जा सकता है।
श्री अरविंद का शिक्षण कहता है कि यह एकमात्र अस्तित्व और चेतना भौतिक तत्व में निहित है। उत्क्रांति की प्रक्रिया के माध्यम से यह स्वयं को मुक्त करता है; जो अचेतन प्रतीत होता है उसमें चेतना प्रकट होती है, और एक बार प्रकट होने के बाद यह अंतःप्रेरणा से ऊँचाइयों की ओर बढ़ती है और साथ ही अधिक पूर्णता की ओर विस्तार और विकास करती रहती है। जीवन चेतना की मुक्ति का पहला चरण है; मन दूसरा है; किंतु उत्क्रांति मन पर समाप्त नहीं होती — उसे एक विशाल चेतना में मुक्ति की प्रतीक्षा है, एक ऐसी चेतना जो आध्यात्मिक और अतिमानसिक है। उत्क्रांति का अगला चरण सचेतन जीव में अतिमानस और आत्मा के प्रभुत्व की दिशा में ले जाएगा। क्योंकि तभी जड़ तत्व में समाहित दिव्यता स्वयं को पूर्ण रूप से मुक्त करेगी और जीवन में पूर्णता का आविर्भाव संभव होगा।
प्रकृति ने उत्क्रांति के पूर्व-शिखरों को वृक्ष और पशु जीवन में सचेतन संकल्प के बगैर प्राप्त किए हैं, किंतु मनुष्य में यह उत्क्रांति सचेतन संकल्प को साधन बनाकर संभव होती है। हालांकि इसे पूर्ण रूप से करने के लिए मानव का मानसिक संकल्प अक्षम है, क्योंकि मन की पहुँच एक सीमा तक ही होती है और उसके बाद वह एक ही वृत्त में घूमता रहता है। एक परिवर्तन आवश्यक है — चेतना को एक मोड़ देना है ताकि मन का ऊर्ध्वगामी सिद्धांत में परिवर्तन हो सके। यह प्रक्रिया प्राचीन योग के मनोवैज्ञानिक अनुशासन और अभ्यास से पायी जाती है। अतीत में इसके द्वारा संसार से दूर होकर आत्मा या अस्तित्व की ऊँचाइयों में विलीन होने का प्रयास किया गया है। श्री अरविंद सिखाते हैं कि ऊर्ध्व सिद्धांत का अवतरण संभव है, जो आध्यात्मिक जीव को केवल विश्व से ही मुक्त नहीं करेगा, बल्कि उसे विश्व में भी मुक्त करेगा। मन की अज्ञानता या उसके सीमित ज्ञान को एक अतिमानसिक सत्य-चेतना से बदलेगा, जो अंतःकरण का सक्षम साधन बनेगा और मानव के लिए बाह्य जीवन में तथा आंतरिक विश्व में आत्म-खोज करना और उसकी वर्तमान पशुता से एक दिव्य जाति में विकिसित होना संभव बनाएगा। योग की मनोवैज्ञानिक साधना का उपयोग इस दिशा में किया जा सकता है, जो ऊर्ध्व और गूढ़ अतिमानस सिद्धांत के अवतरण और उसके कार्य से सम्पूर्ण अस्तित्व को एक परिवर्तन या रूपांतरण के लिए तैयार कर सकती हैं।
हालांकि, यह परिवर्तन एक ही क्षण में, शीघ्रता से या किसी चमत्कारिक रूपांतरण के द्वारा नहीं किया जा सकता। अतिमानस का अवतरण संभव हो उससे पहले साधक को अनेक चरणों से गुजरना पड़ता है। मनुष्य मुख्यतः अपने बाह्य मन, प्राण और शरीर में रहता है, किंतु उसके भीतर एक आंतरिक अस्तित्व है जिसमें महान संभावनाएँ हैं और जिसकी ओर उसे जागृत होना है — क्योंकि वर्तमान में वह उससे अत्यंत सीमित प्रभाव ही प्राप्त करता है, जो उसे निरंतर अधिक सुंदरता, सामंजस्य, शक्ति और ज्ञान की खोज की ओर प्रेरित करता है। इस कारण से योग की पहली प्रक्रिया इस आंतरिक अस्तित्व के क्षेत्रों को खोलने और वहाँ से बाह्य जीवन जीने की है — एक आंतरिक प्रकाश और शक्ति के माध्यम से अपने बाह्य जीवन को संचालित करने की है। इस प्रक्रिया द्वारा वह अपने भीतर अपने सच्चे स्वरूप के संपर्क में आता है, जो मन, प्राण और शरीर के तत्वों का मिश्रण नहीं है, बल्कि उनके पीछे की वास्तविकता है — जो दिव्य अग्नि की एक चिंगारी है। उसे अपने अंतःकरण में निवास करना सीखना है और उसकी गति को सत्य की ओर ले जाकर शेष प्रकृति को शुद्ध और सत्याभिमुख बनाना है। इसके पश्चात ऊर्ध्व की ओर एक ग्रहणशीलता और एक ऊर्ध्व सिद्धांत का अवतरण संभव हो सकता है। किंतु तब भी पूर्ण अतिमानसिक प्रकाश और शक्ति तत्काल नहीं आते — क्योंकि सामान्य मानव मन और अतिमानसिक सत्य-चेतना के बीच चेतना के कई क्षेत्र हैं। इन मध्यवर्ती स्तरों को खोलना है और उनकी शक्तियों को मन, जीवन और शरीर में नीचे लाना है। केवल इसके बाद ही प्रकृति में सत्य-चेतना की पूर्ण शक्ति कार्य कर सकती है। इन कारणों से यह आत्म-अनुशासन या साधना की प्रक्रिया लंबी और कठिन है, किंतु इसकी अंशमात्र सिद्धि भी अपार उपलब्धि के समान है — क्योंकि यह अंतिम मुक्ति और पूर्णता को अधिक संभव बनाती है।
पुरानी प्रणालियों में बहुत कुछ है जो मार्ग के लिए आवश्यक है: मन को अधिक विशालता और आत्मा तथा अनंत के अनुभव की ओर अभिमुख करना, जिसे वैश्विक चेतना कहा जाता है उसमें आरोहण, इच्छाओं और आवेगों पर प्रभुत्व; बाह्य तपस्या आवश्यक नहीं है, किंतु इच्छा और आसक्ति पर विजय और शरीर तथा उसकी आवश्यकताओं, लोभ और वृत्तियों पर नियंत्रण अनिवार्य है। इसमें प्राचीन प्रणालियों का एक समन्वय है: ज्ञान का मार्ग जो सत्य और आभास के बीच मानसिक विवेक करता है, हृदय की भक्ति, प्रेम और समर्पण का मार्ग, और कर्ममार्ग जो संकल्प को स्वार्थी उद्देश्यों से सत्य की ओर मोड़ता है और अहंकार का अतिक्रमण कर के उच्चतर वास्तविकता की सेवा की ओर ले जाता है। क्योंकि सम्पूर्ण अस्तित्व को प्रशिक्षित करना है ताकि जब उस महान प्रकाश और शक्ति के लिए प्रकृति में कार्य करना संभव हो तब वह प्रतिभाव दे सके और रूपांतरित हो सके।
इस अनुशासन में गुरु की प्रेरणा और कठिन समय में उनका नियंत्रण और सन्निधि अनिवार्य है — क्योंकि अन्यथा इस मार्ग पर बिना किसी भूल-चूक के चलना असंभव है और इस कारण सफलता भी असंभव हो जाती है। गुरु वह हैं जिन्होंने एक ऊर्ध्व चेतना और अस्तित्व तक आरोहण किया है और उन्हें अक्सर उसके अवतार या प्रतिनिधि के रूप में देखा जाता है। वे अपने शिक्षण के माध्यम से और उससे भी अधिक अपने प्रभाव और उदाहरण के माध्यम से, और सबसे अधिक अपने अनुभव को दूसरों को अर्पित करने की शक्ति के माध्यम से सहायता करते हैं।
यह श्री अरविंद का शिक्षण और अभ्यास की पद्धति है। उनका उद्देश्य किसी एक धर्म का विकास करना, पुराने धर्मों को एकछत्र में लाना या कोई नया धर्म स्थापित करना नहीं है — क्योंकि इनमें से कोई भी प्रवृत्ति उनके मुख्य लक्ष्य से दूर ले जाएगी। उसके योग का एकमात्र उद्देश्य है आंतरिक आत्म-विकास, जिसके माध्यम से उसका अनुसरण करनेवाला प्रत्येक व्यक्ति कालांतर में सभी में और सर्वत्र एक आत्मा का अनुभव कर सके, और मानसिक चेतना से उच्च चेतना, एक आध्यात्मिक और अतिमानसिक चेतना का विकास कर सके — जो मानव प्रकृति का रूपांतरण और दिव्यकरण करेगी।
~ श्री अरविंद
शिष्य को पत्र, फ़रवरी 1934
CWSA खंड 36, आत्मकथात्मक टिप्पणियाँ, पृष्ठ 547–550
अनुवाद: अशेष जोशी, ऑरोविल
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